State Highway 25 पर रोमान्चक off-roading (हरदोई से लखनऊ जाने वाली सड़क का रोमान्च)

 हमारे और आप के जीवन मे अक्सर ऐसा होता है की जिंदगी पटरी पर आ जाती  है और जीवन मे एकरसता सी हो जाती है। अगर आप के साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है और आप हरदोई या लखनऊ या संडीला या काही भी रहते हो, मुझे क्या, पर मै आप को एक रोमान्चक off-roading ट्रिप वो भी मात्र 50 से 100 रुपए मे करने का तरीका जरूर बता सकता हू। (नोट- 100 रुपए वाली सुविधा सिर्फ हरदोई और संडीला निवासियों के लिए है, शर्ते लागू।) और इस रोमान्चक off-roading के लिए आप को किसी off-road गाड़ी जैसे टाटा तूफान(स्टार्म) या महेन्द्रा बिच्छू(स्कॉर्पियो) की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। वैसे अगर आप की औकात मे ये गड़िया है तो अंकल जी  आगे जो भी लिखा है उसे व्यंग समझो और माफ कर दो, मेरे खिलाफ कलेक्ट्रेट मे धरना देने मत बैठ जाना।
  अब मै बताता हू की कैसे करे "State Highway 25/हरदोई-लखनऊ रोड" पर यह रोमान्चक off-roading-
  1. सबसे पहले चेक करे की कोई हिन्दू/मुस्लिम त्योहार पिछले 7 दिनो मे न हुआ हो और न  अगले 7 दिनो मे हो, शादियो का सीजन भी न हो।
  2. अब हरदोई के रोडवेज बस अड्डे पर आराम से 11 बजे के बाद पाहुचे और पूछ-ताछ वाले काउंटर पर बैठी आंटी जी से लखनऊ जाने वाली बस के बारे मे पूछे। वो आप को तुरंत बता देगी। (रोमान्च की प्रतिक्षा करे)
  3. सबसे पीछे खिड़की वाले सीट पकड़ के बैठ जाए। (रोमान्च की प्रतिक्षा करे)
  4. कंडेक्टर से संडीला तक का टिकट बनवा ले। (रोमान्च की प्रतिक्षा करे)
  5. कोई 20 मिनट और रोमान्च की प्रतिक्षा करे।
  6. अचानक से आप को बस की चाल अजीब सी प्रतीत होगी, मुंडी बाहर निकालना, ध्यान से देखना सड़क हेमा(भाजपा MP) के गाल के बजाय चेचक के भुक्त-भोगी के गाल जैसे दिखेगी। नोट- दाई ओर बैठे हो तो किसी ट्रक के आने और मुंडी निकालने पर जान जाने का सौभाग्य भी है। (रोमान्च की प्रतिक्षा समाप्त)
  7. घर के हरदोई के किसी विधायक(सड़क का वो हिस्सा जिनके भी क्षेत्र मे आता हो) और भूत हो चुकी एक कर्मठ वर्मा आंटी(*आंटी के अलावा कोई संसदीय शब्द शब्दकोश मे उपलब्ध नहीं) एवं चंडीगढ़ निवासी वर्मा जी के हरदोई क्षेत्र के बारे मे असीम ज्ञान और विकास और न जाने कौन कौन सी चीजों का नतीजा है सड़क का यह 2 km से भी लम्बा हिस्सा, और अब इसका और विस्तार ओवर लोडेड ट्रक कर ही रहे है। (क्रेडिट देना पड़ता है, वरना लोग बुरा कैसे मानेगे)
  8. sorry, मै थोड़ा इमोशनल हो गया था! you know. But hope की कोई और न हो।
  9. सड़क का यह जो कई किलोमीटर का हिसा है यह पिछले 4 सालो से मैंने ऐसा ही देखा है, वो बात अलग है की दिल्ली से लेकर शायद लखनऊ तक की पंचायते और सरपंच बादल गए है। स्याला एमोशन है की जा ही नहीं रहा है। 
  10. बस के अंदर आप उछालने लगेगे। आप को मजा भी आ रहा होगा और ..... (खैर छोड़ो)। आप बस की सीट पर बैठे बैठे उतना उछल जाएगे जितना आप बचपन मे भी नहीं उछले होगे। आप अगर पीछे वाले सीट पर है और बस आधी ही भरी है तो आप 3फुट से अधिक उछलने का सौभाग्य भी पा सकते है। 2 फुट तक बैठे बैठे उछलने की गारंटी मेरे। आप अपने जीवन के सबसे रोमान्चक पालो को जी रहे होगे, enjoy! 
  11. एक नाली जितने पानी वाली नहर या शायद नदी पर एक पुलिया से गुजरने के बाद अगर दाई ओर खेतो मे "इंटरनेशनल" लिखा दिखे तो समझिएगा की इस यात्रा का सबसे बड़ा रोमांच खत्म हो चुका है पर अभी और भी कुछ है आप के लिए। 
  12. अब बस के अगले हिस्से मे आ जाए। इतने आगे और इस तरह से बैठे की आप को windscreen से सड़क दिखे। उसके बाद कोई "बाघौली चौराहा" आएगा, वह से सड़क पर नजरे गड़ाए बैठे रहे। जैसे ही speed breaker दिखे तो समझ जाइए की आप उत्तर प्रदेश के State Highway 25 पर उस जगह है जहा यमराज ने परमानेंटली एक यमदूत को ड्यूटी पर रखा है। ये रोडवेज के ड्राइवर रोज वह आते जाते है इस लिए यमदूत अंकल तुम्हें बक्स देगे। पर फिर भी आप घुमावदार मोड और यमदूत की निगरानी का मजा शायद ही मिस करे। 
  13. अब बालामऊ नाम की एक जगह आएगी और उसके बाद एक वीराना जिसमे पता नहीं क्यो थोक के भाव बिजली के खंभे लगे हुए है। उसके बाद बाई ओर बबूल के झाड जो जंगल जैसे हो गए है उनके दिखने का इंतजार करे। 
  14. बबूल के झाड़ो को देखने के बाद शायद "डाबर" या किसी और 5-10 साल पुराने कारखाने से आती एक बेहतरीन बदबू को सूंघे और इस रोमान्च का आखरी बदबूदार पल झेले! 
  15. संडीला मे उतार कर फिर हरदोई के लिए रोडवेज बस पकड़े और पुनः बदबू, यमदूत और off-roading का आनंद ले।  
  16. पहले यह यात्रा लखनऊ के छोटे इमामबाड़े के पीछे भी off-roading का अनुभव देती थी पर अब पहले से देखा रूमी दरवाजा दिखाते है इस लिए लखनऊ तक नहीं जाना है, हरदोई जनपद मे ही रहे।

नोट- 4 मीटर से कम लंबी गाड़ी से यात्रा करने पर off-roading तो नहीं पर यमदूत से मिलने का मौका जरूर मिल सकता है, suv वालो- अंकल मै आप से बहुत डरता हू, निजी बस से हरदोई से संडीला तक सिर्फ बदबू ही मिलेगे, off-roading नहीं।

गाय को पूजने वालो के लिए संदेश- 15 साल पहले जहा "डाबर" जैसे आयुर्वेदिक कंपनी का बोर्ड लगा दिखता था 5 साल से वही से रसायनिक बद्बू आ रही है, कृपया इसके खिलाफ भी कोई अभियान चलाये। बूचड़ खाना तो अभी भविष्य के गर्भ मे है शायद।

दबंग पत्रकार?

विधायक जी के दो बड़े चमचे सेक्स स्कैंडल में फस चुके थे. ये खबर टीवी पर तो नहीं आई थी पर हर बड़े हिंदी/अंग्रेजी अख़बार में जगह पा चुकी थी. पहले चमचे के कारनामे 2 महीने पहले उजागर हुए थे और दुसरे के कारनामे इसी सोमवार को लोगो को पता चले थे. पर लोगो को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था. ये सिर्फ विधायक से पीड़ित और विरोधियो के लिए मायने रखता था.

 पर फेसबुक पर हलचल सुरु हो चुकी थी. तभी कस्बे के दूसरे सबसे अधिक बिकने वाले अखबार के जिला संवाददाता जिन्हें लोग ब्यूरो प्रमुख भी कहते थे की एक फोटो इन सेक्स स्कैंडलो को उजागर करने वाले 'हीरो' के रूप में शेयर की गयी. फोटो में एक 35 साल का आदमी था. उसके सामने मेज पर वो अख़बार था जिसके लिए वो काम करता था. एक मोबाईल फोन था टेलीफोन भी था. पर मेज पर मौजूद रिवाल्वर पता नहीं क्या कह रही थी. वैसे वो 35 साल का बंदा कलम का सिपाही था पर उसकी मेज पर तो तमंचा था. कलम भी थी उस मेज पर... 3रुपये वाली सबसे सस्ती यूज एंड थ्रो(जिकी इंक ख़तम होने पर फेक देते है) वाली.

 नीचे कमेन्ट था दबंग पत्रकार....

पर वो पत्रकार था क्या???
पत्रकार कलम के सिपाही होते है... सस्ती और उपयोग के बाद फेक दी जाने वाली कलम वाले नहीं... रिवाल्वर को कलम से प्रमुखता देने है तो बिलकुल नहीं... अगर होते है तो वो कलम क्यों नहीं छोड़ देते क्योकि वे तो तलवार को कलम से ताकतवर मन ही चुके है.

राम मनोहर लोहिया पार्क, हरदोई (स्थापित वर्ष- 1973)

ये फोटो हरदोई के एक मैदान की है जिसको संपत्ति विवाद से बचाने के लिए सत्ताधारी सपा के पोस्टर बॉय के नाम कर दिया गया है और सम्पति विवाद से हमेशा के लिए या कम से कम अगले 4 सालो के लिए मुक्ति पा ली गयी है.
वैसे स्थापित वर्ष- 1973 लिखा गया है पिछले महीने बने इस मैदान को पार्क घोषित करने वाले इस फाटक पर.
मुझे ये सोच कर अजीब लग रहा है कि जिस अखिलेश यादव सरकार की वजह से इस को राम मनोहर लोहिया का नाम मिला है उसके मुखिया अखिलेश यादव भी 1973 में ही पैदा हुए थे.

रेल के डिब्बे में दिखा एक romantic couple (मेरी डायरी से)

साहित्य से अभी ठीक तरह से मेरा वास्ता नहीं पड़ा है सो "प्रेम" रूपी भाव का चित्रण फिल्मो में ही देखा है....
मै फिल्मी प्यार को बकवास और बेवकूफी की इन्तहां मनाता हूँ.... और अब तो हमारी फिल्मो का हीरो SEX शब्द के निकट और LUV से दूर है..... LOVE से तो उसका वास्ता भी नहीं है. 
और पता नहीं क्यों मुझे आज तक जो भी couple मिले है वो "निःस्वार्थ प्रेम" में नहीं थे. पर इसके इतर एक जोड़ा दिखा है जिसके बारे में लिख रहा हूँ.

रात के 1 बजकर 27 मिनट पर हरदोई रेलवे स्टेशन पर जैसे ही लखनऊ जाने वाली ट्रेन आई मै आगे की तरफ लगे general डिब्बो में से पहले डिब्बे के साथ भागने लगा. उस पहले डिब्बे में भीड़ कम थी पर इतनी भी कम नहीं थी की मुझे बैठने को जगह मिल जाती. और हुआ भी वाही मुझे खड़े-खड़े हरदोई से लखनऊ का 2 घंटे का सफ़र करना पड़ा. पर उस 2 घंटे के सफ़र में मै पता नहीं क्यों उस डिब्बे के बीच की सीटों के पास जमीन में बैठे एक जोड़े पर मेरा ध्यान गया. करीब 20 सेकंड में ही मुझे पता चल गया था की वे या तो बॉय फ्रैंड-गर्ल फ्रैंड है या ऐसे पति-पत्नी जिनकी शादी साल भर से जादा पुरानी नहीं होगी. वो दोनों उस general डिब्बे की फ़र्स पर बैठे-बैठे सो रहे थे. वे किसी प्रकार की गलत स्थिति में नही थे पर फिर भी...........

मैंने उसके बाद उस डिब्बे के अन्य couples की ओर ध्यान दिया. सभी हिन्दू थे....... मतलब महिलाये साडी और मंगल सूत्र धारण किये हुयी थी. कोई भी उस रेल के डिब्बे की फ़र्स पर नही बैठा था. सभी के साथ एक बच्चा अनिवार्य रूप से था. और वे बस एक ही भाव में थे की जल्दी स्टेशन आये और वो इस रात की रेल यात्रा से मुक्ति पाए.

पर ऐसा नही था कि उस फ़र्स पर बैठे couple को कोई समस्या नहीं थी पर वो समस्याए उन पर हावी नहीं हो रही थी. कुछ देर के लिए जब उनके पड़ोस की सीट पर बैठा व्यक्ति जब टॉयलेट गया तो वो लड़का उसकी जगह पर बैठ गया जबकि लड़की निचे फ़र्स पर ही बैठी रही. फिर वो लड़की उस लड़के के पैर भी दबाने लगी.... पर तभी न जाने क्या हुआ कि वो लड़की उस लड़के की गर्दन दबाने की धमकी देती हुई उस लड़के की गर्दन तक पहुच गयी. शायद इसी तरह के बच्चो जैसे व्यवहार की वजह से वो उस डिब्बे के बाकि लोगो जितने परेशान नही दिख रहे थे.

अगर वे शादी शुदा थे तो उस लड़की के पहनावे के आधार पर वे मुस्लिम रहे होगे और अगर वे gf-bf रहे होगे तो निकट भविष्य में वे honor killing के शिकार होगे इसकी सम्भावनाये प्रबल है. पर वे उस डिब्बे के अन्य जोड़ो की तरह साथ होकर भी अलग-अलग नहीं थे.............

पता नहीं क्यों science fiction नहीं लगाती है Iron Man 3

(निवेदन - अगर आप ने Iron Man 1, 2 और The Avengers नामक फिल्मे नहीं देखी है तो Iron Man 3 आप के देखने लायक नहीं है और नीचे जो भी लिखा है वो भी आप के लिए नहीं है)          
Iron Man................. 
एक ऐसा सुपर हीरो जो मुझे इस सीरिज की पहली फिल्म में झकझोर कर कहता है की बेटा देख सुपर हीरो वो भी हो सकता है जो तेरी मेज पर रखी फिजिक्स और केमिस्ट्री की किताबों का एक-एक शब्द जानता है..... जो तुझे पकाऊ लगने वाली मोटी स्टेटिक्स की किताब के हर सवाल को हल कर सकता है.......
तो अब जब इस Iron Man सीरिज की तीसरी या शायद चोथी फिल्म आ चुकी है तो इसी के बारे में कुछ टाइप करता हूँ........
फिल्म की बाते तो होती रहेगी पर एक ख़ास बात थी इस फिल्म में.... "कमल हसन" की "विश्वरूपं" के जैसे कुछ सीन... लगा की कमल जी को sms करके कहू की भाई बधाई हो आप की फिल्म के सीन विदेशी हूबहू चुरा रहे है..
पुरे देश को आप पर गर्व है. 
इस फिल्म में वैसे तो बहुत कुछ है और कुछ भी नहीं है....
मुझे बड़ी उम्मीद थी कि Ben Kingsley इस फिल्म में "जोकर" से भी बड़े सिरफिरे विलेन होगे पर ऐसा हो न सका. अब "अमर उजाला" टाइप में लिख रहा हूँ...... थोडा ध्यान से पढियेगा........

कहानी-
फिल्म की कहानी सुरु होती है एक पार्टी से जिसमे पहली फिल्म वाला और कई भाषा बोलने वाला टोनी का सहायक उससे पहली बार मिला था. पर वो बस एक सीन में ही है. असली कहानी है टोनी की 1999 की उस पार्टी के समय वाली महिला मित्र की जो एक ऐसी दवा विकसित कर रही है जो जन्तुओ और वनस्पतियों के टूटे और काटे हिस्सों को अपने आप सही कर देती है. फिर कई सालो बाद वो और उसका बॉस टोनी को मजबूर करते है उस दवा की कमियों को दूर करने के लिए. पर बीच में ही टोनी की उस भूत पूर्व महिला मित्र का जमीर भी जाग जाता है और फिल्म के अंत में टोनी की छाती पर लगा वो चमकीला और छोटा रिएक्टर भी गायब हो जाता है.

Ben Kingsley, पाकिस्तान और लादेन-
फिल्म में Ben Kingsley बिलकुल उस भारतीय विलेन की तरह है जो पकडे जाने पर कहता था हजूर ये हम ने नहीं किया है और हीरो के पैरो को पकड़ लेता है....... पर इसके बाद देशी विलेन हीरो को चकमा देता है पर Ben Kingsley ऐसा नहीं करते है और बाद में पता चलाता है कि सच में वो विलेन था ही नहीं.

इस फिल्म में पाकिस्तान में लादेन का मिलना और ड्रोन हमले दोनों को आम से भी आम बात माना गया है. अमेरिकी सेना को सेवा देने वाला एक लोहे के सूट को पहनने वाला पाकिस्तान में यू घुसता है जैसे उस के घर की खेती हो. पर पाकिस्तानी भी उससे नहीं डरते है... जबतक वो उन्हें डराता नहीं है. पर विलेन के सहयोगी भी पाकिस्तान में होते है.

लादेन एक कठपुतली था... जिसे किसी ने अपने मुखौटे के रूप में प्रयोग किया था जिससे वो खुद बचा रहे और अपना काम भी निकाल सके....... ऐसा यह फिल्म कहती है और लादेन के अलावा दो और नाम भी गिनाये जाते है.

Science fiction-
यह फिल्म Iron Man के बाद आई Iron Man 2 के बाद आई The Avengers के बाद आई है. पहली दो फिल्मे Science fiction थी पर तीसरी फिल्म क्या थी पता नहीं और शायद इसी लिए Science fiction होने के बावजूद यह फिल्म Science fiction नहीं लगती.

इस बारे में फिल्म में एक जगह The Avengers के "हथोडा मानव" का नाम लेके सफाई भी दी जाती है कि जब पीछली फिल्म "चमत्कारिक" थी तो यह भी क्यों न हो?

क्यों देखे-
गर्मियों की छुट्टियों में बच्चो के साथ सिनेमा घर जाने के लिए. कुछ हवाई करतब देखने के लिए. रा-वन की प्रेरणा देने वाले सुपर हीरो से मिलाने के लिए.

क्यों न देखे-
अगर आप 13 से 28 साल के लोगो के लिए बनाने वाली बेहतरीन फिल्मे देखना पसंद करते है और रा-वन से थोड़ी नहीं काफी बेहतर फिल्म की उम्मीद पाले है.
 

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